मंदिर, मस्जिद और चर्च, सब लगे एक से हमें,
सबने कहा सुधार जा, नहीं तो जन्नत ना मिलेगी तुम्हें,
हमने भी पूछ लिया, जब हम ना रहें,
तब जलाओगे या ढफनाओगे हमें,
या छोड़ दोगे सरने को,
गिद्धों के चरने को,
जो भी करोगे, मिट्टी में मिल जाऊंगा,
जहां से आया था, वही लौट जाऊंगा।
तुम अपनी बताओ, कहां जा रहे हो?
स्वर्ग, जन्नत, हेवन किसमें बुकिंग करा रहे हो?
ये भी पता है कि कितने में टिकट मिलती है?
या जो ठेकेदारों ने मांगा, वही चुकाए जा रहे हो?
अब बताओ कीमत न चुकाने की कीमत क्या है?
कुछ कम कमाने वालों की किस्मत में क्या है?
क्या एक गलत कर्म से जन्नत छूट जाएगी?
या एक सही कर्म से वापस मिल जाएगी?
कब तक नरक, दोजख, हेल से डरते रहोगे?
यूंही आपस में लड़ते रहोगे?
ख्याल की ताकत मिली बस हम इंसानों को,
कब तक ख्याली बातो पे मारते और मरते रहोगे?
किसकी हिफ़ाज़त करते हो, किसको बचा रहे हो?
क्या उस खुदा को, जिसने हमें बनाया?
या उसको, जिकसो हमने बनाया?
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